प्रदोष व्रत — महत्व, विधि और लाभ
प्रदोष व्रत — महत्व और विधि
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित व्रत है, जो हर पक्ष की त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) रखा जाता है। यह व्रत शिव कृपा, रोग-मुक्ति, संकट-नाश और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है।
श्रद्धा और नियम से किया गया यह व्रत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल लाता है।
प्रदोष व्रत का महत्व
प्रदोष व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है — यह शिव कृपा, रोग-मुक्ति, संकट-नाश और मनोकामना पूर्ति प्रदान करने वाला माना जाता है। भगवान शिव की कृपा से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
प्रदोष व्रत की विधि
प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल-बेलपत्र चढ़ाएँ और «ॐ नमः शिवाय» का जाप करें। व्रत के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर संकल्प लें, दिनभर श्रद्धापूर्वक पूजा-पाठ करें और शाम को व्रत कथा सुनकर विधि अनुसार व्रत खोलें।
व्रत के नियम
- सूर्योदय से पहले स्नान कर संकल्प लें
- मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहें
- क्रोध, झूठ और तामसिक भोजन से बचें
- व्रत कथा सुनें और दान-पुण्य करें
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Frequently Asked Questions
प्रदोष व्रत कब रखा जाता है?
प्रदोष व्रत हर पक्ष की त्रयोदशी तिथि, प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) रखा जाता है।
प्रदोष व्रत किस देवता को समर्पित है?
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है।
प्रदोष व्रत रखने से क्या लाभ होता है?
प्रदोष व्रत से शिव कृपा, रोग-मुक्ति, संकट-नाश और मनोकामना पूर्ति की प्राप्ति मानी जाती है।